साठा पे पाठा मेरे चाचा ससुर-2

मेरी कामुक कहानी के पहले भाग
साठा पे पाठा मेरे चाचा ससुर-1
में आपने पढ़ा कि शादी से पहले मैंने सेक्स नहीं किया था लेकिन दिल मचलता बहुत था चूत चुदाई के लिये… शादी के बाद मेरे सारे अरमाँ पूरे होने लगे, मेरी खूब चुदाई हुई. लेकिन एक दिन मैंने अपने चाचा ससुर को हमारी कामवाली की चुदाई करते देखा.
अब आगे:

और उनके इस प्रेमालाप को देख कर बाहर खड़ी मेरी चूत भी पानी पानी हो रही थी। मैं देखते देखते इतना गरम हो चुकी थी कि मेरा दिल कर रहा था कि मैं भी अंदर चली जाऊँ और रजनी को उतार कर खुद चाचाजी के लंड पर चढ़ जाऊँ।
मगर ऐसा मैं नहीं कर सकती थी।

बेशक मैंने चोपड़ा भाभी से अपने चाचाजी के बारे में कुछ कुछ बातें सुन रखी थी, मगर चाचाजी ने मुझे कभी घूरा नहीं, मेरे साथ कोई हरकत नहीं की, तो मैं कैसे मान लेती के चाचाजी कुछ गलत किस्म के इंसान हैं। हो सकता है चाचाजी के अकेले रहने के कारण चोपड़ा भाभी ने ये खुद ही सोच लिया हो। मगर अब तो मेरे सामने सब कुछ खुल चुका था। एक 60-62 साल का आदमी एक 28 साल की औरत को चोद रहा था, और वो भी हमारी काम वाली बाई।

बेशक रजनी भी शादीशुदा थी, मगर फिर भी यार… पता नहीं नहा कर भी आती है या नहीं, गंदी सी रहने वाली, और चाचाजी उसके साथ?

मैं वापिस अपने कमरे में आ गई, मैं काम की ज्वाला से धधक रही थी, सबसे पहले अपने कपड़े उतार कर बिल्कुल नंगी हो गई, फिर नंगी ही चल कर किचन में गई और एक खीरा उठा लाई, और फिर अपने बेड पे लेट कर उस खीरे को अपनी चूत में लेकर आगे पीछे करने लगी।

उधर रूम में से रजनी की हल्की हल्की सीत्कार मुझे सुन रही थी और इस कमरे में मैं खीरे से अपनी चूत को ठंडा कर रही थी। चाचाजी और रजनी से पहले मैं झड़ गई, मैंने फिर से अपने कपड़े पहने और बेड पर बैठ कर टीवी देखने लगी।

करीब 15 मिनट बाद रजनी चाचाजी के कमरे से निकली और पहले झाड़ू पोंछा करने लगी।
जब वो मेरे रूम में आई, तो मुझे बेड पे बैठा देख कर एकदम से डर गई- अरे भाभी, आप यहाँ?
मैंने पूछा- क्यों अपने ही घर में मुझे नहीं होना चाहिए?
वो बोली- जी वो आप तो पड़ोस में गई थी।
मैंने कहा- हाँ गई थी, अगर ना आती तो तुम्हारी करतूत का पता कैसे चलता?

वो घबरा गई और सारा काम धाम छोड़ कर चली गई। उसके जाने के बाद मैंने ही सारे घर की सफाई की। चाचाजी भी अपने कमरे से बाहर नहीं निकले। दोपहर को मैं ही उन्हें खाना देकर आई, मगर हम दोनों में कोई बात नहीं हुई।

रात को मैंने सपने में देखा कि चाचाजी वैसे ही अपने बिस्तर पे बिल्कुल नंगे लेटे हैं और रजनी की जगह मैं अपनी साड़ी उठा कर उनके ऊपर बैठी उनका लंड ले रही हूँ।

मेरी एकदम से नींद खुल गई और मैं अपने चाचाजी के सेक्स संबंध के बारे में सोचने लगी। सोचते सोचते मैं फिर से गरम हो गई, मैंने अपने पति को जगाया, मगर वो नहीं उठे, अभी दो घंटे पहले ही तो मुझे तड़पा तड़पा कर चोदा था, और थक कर सो गए थे।

जब वो नहीं जागे तो मैंने उनका सोते हुये ही उनका ढीला लंड अपने मुँह में लिया और बस अगले पल ही मेरी उंगली मेरी चूत में थी। वो सोते रहे और मैं उनका ढीला लंड चूसते चूसते, चाचाजी से चुदवाने के खयाल में अपनी ही उंगली से अपनी चूत को ठंडा करने लगी।

अगले दिन मेरा मन बन चुका था कि कुछ भी हो जाए, मैं भी चाचाजी से सेक्स करूंगी। मगर कैसे कर सकती हूँ, और हम दोनों में कभी कोई भी ऐसी वैसी बात नहीं हुई थी, कैसे मैं चाचाजी का ध्यान अपनी और खींचूँ।
उधर रजनी ने शायद सारी बात चाचाजी को बता दी थी, इस वजह चाचाजी भी मुझसे कुछ कटे कटे से रहने लगे। जब बात ही नहीं हो रही हो, तो बात शुरू कैसे हो।

मगर इतना ज़रूर था कि रजनी अब पहले से ज़्यादा बिंदास हो गई थी, जिस दिन वो सलवार सूट पहन कर आती उस दिन हमेशा बिना दुपट्टे के चाचाजी के कमरे में जाकर साफ सफाई करती, और सबसे ज़्यादा देर वो वहीं लगाती। मैं अपने रूम में तड़पती।

फिर धीरे धीरे ये होने लगा कि चाचाजी भी कुछ बेशर्म से हो गए, और जब रजनी आती, उनके कमरे में सफाई करने जाती, तो अपने कमरे का दरवाजा अंदर से बंद कर लेते और रजनी को टिका के पेलते, उसकी चीखें, सिसकारियाँ, मुझे बाहर सुनती। वो अंदर चुदवाती, और मैं बाहर खड़ी अपनी चूत में उंगली करती।

मगर मैं कब तक उंगली करूँ, यही सोच कर मैंने सबसे पहले अपनी ड्रेसिंग सेंस को बदला। मैं पहले साड़ी अपनी नाभि से ऊपर बांधती थी। मगर अब मैंने सबसे पहले अपना पेटीकोट नीचे बांधा, जितना नीचे मैं बांध सकती थी।

जब तक रजनी घर में होती, मैं अपने ही रूम में रहती, मगर उसके जाने के बाद मैं अपनी साड़ी को नीचे करके बांधती ताकि मेरी नाभि दिखे, मेरी कमर दिखे। साड़ी के साथ ब्लाउज़ पहनती तो हमेशा ऊपर से एक दो बटन खुले छोड़ती, ताकि मेरे बूब्स का क्लीवेज दिखे और चाचाजी भी उसे देखें।

घर में लंबी कुर्ती की जगह शॉर्ट कुर्ती पहनने लगी, ताकि उसके नीचे से पहनी मेरी लेगिंग से मेरी टाँगों और खास करके मेरी जांघों के आकार का प्रदर्शन हो। कभी कभी जीन्स, निकर और स्कर्ट भी पहनती।

मेरी मेहनत रंग लाने लगी, मैंने नोटिस किया कि चाचाजी भी मेरी तरफ देखने लगे।

सुबह जब उठती तो नाईटी में ही चाचाजी को चाय देने जाती। नाईटी के खुले गले वो अक्सर मेरे गोरे और भरपूर मम्मों के दर्शन करते। समझ शायद वो भी गए थे कि मैं उन्हें क्या दिखा रही हूँ, और क्यों दिखा रही हूँ।
इसी वजह से वो अब मेरे साथ खुलने लगे थे।

हम दोनों की आदत थी कि अक्सर दोपहर के खाने के बाद साथ में बैठ कर बातें करते, दुनिया जहां की बातें करते। उन्होंने मुझे अपने जीवन के बारे में सब बतया।
मैंने पूछा भी- चाचाजी, डाइवोर्स के बाद आपने दोबारा शादी क्यों नहीं की?
वो बोले- मुझे ज़रूरत ही महसूस नहीं हुई।
मैंने जानबूझ कर पूछा- कोई भी ज़रूरत महसूस नहीं हुई?

वो समझ गए कि मैंने क्या पूछा है, वो बोले- मैं मेनेज कर लेता हूँ।
मैंने हंस कर कहा- रजनी के साथ?
वो भी हंस दिये- तो तुम्हें सब पता है।
मैंने कहा- हाँ, सब पता है, पर चलो कोई बात नहीं, आपको भी कोई साथ चाहिए, अपने दर्द भुलाने को!

वो भी हंस दिये, और मैं भी। मतलब अब सारी बात साफ हो चुकी थी।

उसके बाद तो चाचा ने जब भी रजनी के साथ सेक्स करना होता तो कभी भी अपने रूम के दरवाजे को लोक नहीं करते थे, बस हल्का सा ओटा देते थे।

अब तो चाचाजी भी मेरे बहुत अच्छे दोस्त बन गए थे और रजनी भी। वो खुल्लम खुल्ला उनके रूम में जाती और चुदवा कर आती।
मैं भी उसे मज़ाक करती- मरवा आई?
वो भी हंस के कहती- हाँ भाभी!

ऐसे ही चलता रहा, मगर चाचाजी अभी तक मुझसे थोड़ी दूरी बनाए हुये थे, जबकि मैं हर रोज़ उनके और करीब और करीब होती जा रही थी।

एक दिन मैं जानबूझ कर अपनी साड़ी अपनी कमर से भी नीची बांधी। झांट के बाल जहां से शुरू होते हैं, वहाँ बांधी। और जब मैं उनको चाय देने गई, तो चाचाजी अपने अखबार छोड़ कर मेरी तरफ देखने लगे।
मैं उनके पास जा कर खड़ी हो गई और उनसे बोली- चाचाजी चाय!
मगर वो मेरे गोरे पेट, और मेरी नाभि को ही देखे जा रहे थे।

मैंने झुक कर उनके आगे चाय का कप किया, मगर असल में मैंने उनको अपने मम्में दिखाने का जुगाड़ किया था। उन्होंने एक निगाह मेरे मम्मों की तरफ मारी और फिर चाय का कप लेकर रख लिया और जब मैं सीधी खड़ी हुई तो फिर से मेरी नाभि को देखने लगे।
मैंने पूछा- क्या देख रहे हो चाचाजी?
वो बोले- तुम्हारी नाभि!
मैंने कहा- क्या कहा आपने?

वो हड़बड़ा गए- अ… कुछ नहीं, कुछ नहीं।
मैं उनके पास ही खड़ी रही और बोली- आपको मेरी ये नई साड़ी कैसी लगी?
और मैंने साड़ी का पल्लू पकड़ कर उनको घूम कर दिखाया।

मुझे पता था कि वो मेरी कमर को ही घूर रहे थे।
वो बोले- बहुत सुंदर।
मैंने कहा- चाचाजी, मैंने सोचा है, मैं न अपनी नाभि में यहाँ एक छल्ला डलवा लूँ, ठीक है?
कह कर मैंने अपना पेट बिल्कुल उनके सामने किया, उनकी निगाह फिर से मेरी नाभि में ही अटक गई। मैंने उनका हाथ पकड़ा और उसको अपनी नाभि पर रखा। एक करंट सा मुझे लगा, मगर उन्हें तो बहुत तेज़ झटका लगा हो जैसे… उन्होंने एकदम से अपना हाथ खींच लिया।

मुझे भी लगा ये कुछ ज़्यादा हो गया तो मैं भी अपने रूम में वापिस चली आई।

अगले दिन फिर मैंने उनको अपनी नाभि के दर्शन करवाए और इस बार फिर वही नाभि में छल्ले वाली बात की और उनका हाथ अपनी नाभि पर रखा, तो उन्होंने बड़े प्यार से मेरी नाभि के इर्द गिर्द अपनी उंगली फिराई, और किसी बड़े एक्सपर्ट की तरह मुझे बताने लगे कि नाभि में छल्ला कहाँ डलवाना है।

पर उनके इस तरह से छूने से मैं तो दीवानी हुई जा रही थी। उन्होंने मेरी नाभि के अंदर भी अपनी उंगली घुसाने की कोशिश की, मैंने उसी मदहोशी में कहा- ये गलत जगह है।
वो एकदम से हट गए।

इतना तो मुझे भी साफ हो गया था कि चाचाजी अब मुझे भी चोदने की सोचते तो होंगे, मगर किसी वजह से वो हिम्मत नहीं कर पा रहे हैं। उनकी हिम्मत बढ़ाने के लिए मुझे कुछ बड़ा करना होगा।

एक बार मेरे हसबेंड किसी काम की वजह से बाहर गए हुये थे, तो रात को सोने पहले चाचाजी को जब मैं दूध देने गई तो मैंने जानबूझ कर अपनी पीली नाईटी पहनी। वो पीली नाईटी बहुत पतली थी। उस पीली नाईटी में से मेरे दोनों निप्पल और शरीर की सारी बनावट बड़े आराम से दिखाई देती थी। बस यूं समझ लो को वो नाईटी पहन कर भी मैं नंगी ही थी।

दूध का गिलास रखकर मैं भी चाचाजी के सामने उनके बेड पर ही बैठ गई। वो बैठे बैठे दूध पी रहे थे और मुझसे बातें करते करते बार बार मेरे बूब्स के निप्पल और मेरी जांघें भी ताड़ रहे थे। मैंने पूछ ही लिया- चाचाजी, क्या देख रहे हो?
उन्होंने मुझसे उल्टा सवाल पूछा- बेटा तुम ब्रा नहीं पहनती क्या?
मैंने कहा- पहनती हूँ, पर रात को उतार देती हूँ, पर आपने ऐसा क्यों पूछा?
वो बोले- वो तुम्हारे निपल्स दिख रहे थे न इसलिए पूछ लिया।
मैंने कहा- तो क्या आपकी निगाह मेरे जिस्म पर ही रहती है?

वो एकदम से चुप से हो गए जैसे मैंने उन्हें डांट दिया हो। मुझे भी लगा कि मैंने गलत बात बोल दी, मैं उठ कर जाने लगी, तो उन्होंने मेरा हाथ पकड़ लिया, बोले- बैठ जा बहू, कुछ देर बातें करते हैं, आज तो भतीजा भी नहीं है.

मैं बैठ गई और उसके बाद हम दोनों कितनी देर तक बातें करते रहे। करीब 11 बजे मैं अपने कमरे में आई। मगर मेरी चूत तो पानी पे पानी छोड़ रही थी। रूम में आते ही मैंने अपनी नाईटी उतार फेंकी और नंगी ही बेड पे जा लेटी, अपनी उंगली चूत में डाली और चाचाजी चाचाजी करती हुई ने पानी छोड़ा।

कहानी जारी रहेगी.
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कहानी का अगला भाग: साठा पे पाठा मेरे चाचा ससुर-3

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