सलहज के साथ ससुराल में किया डिंग डाँग- 2

सेक्स इन ला रिलेशन स्टोरी में पढ़ें कि कैसे मैंने अपनी बीवी की भाभी को ससुराल में चोदा. मेरा साला कई महीने से बाहर था तो उसकी चूत भी लंड मांग रही होगी.

कहानी के पहले भाग
सलहज की चूत मारने की तमन्ना
में आपने पढ़ा कि मैं अपनी ससुराल में था और अपने साले की बीवी को चोदना चाहता था. हालात अनुकूल थे और मेरी सलहज मेरे पास मेरे कमरे में थी. मैं अपनी मंशा जाहिर कर चुका था और वो भी इसके लिए राजी हो चुकी थी.

अब आगे सेक्स इन ला रिलेशन स्टोरी:

मैंने एकता की पैंटी उसकी गांड से सरकाते हुए उसके घुटनों तक नीचे कर दी और अपना हाथ उसकी टांगों के बीच से आगे ले जाकर उसकी चूत में हल्के हल्के घर्षण करने लगा।
एकता जैसे इस सब के लिए अब तक तैयार हो चुकी थी और उसकी घबराहट भी अब हल्की हो चुकी थी।

देखते ही देखते मैंने पहले एकता की चूत में एक उंगली डाली और फिर कुछ ही क्षण बाद दूसरी उँगली भी अंदर करके एकता को चुदाई के लिए तैयार करने लगा।

मेरे लिए ये बहुत आश्चर्य की बात थी कि एकता की चूत 8 साल की शादीशुदा औरत के लिए बहुत टाइट थी और मुझे उसमें दो उंगलियां डालने के लिए मेहनत करनी पड़ रही थी।
मेरी दो उंगलियां अंदर जाने पर एकता को भी दर्द हो रहा था और उसकी सिसकियों से मैं इस बात का अनुमान स्वतः लगा सकता था।

एकता मुझे रोकने के लिए कोई प्रयास नहीं कर रही थी पर उसका सिसकना बरकरार था।
मैंने एक हाथ से अपने लण्ड को सहलाना शुरू किया और दूसरे हाथ से एकता की चूत का मर्दन जारी रखा।

क्योंकि मेरे पास खेलने के लिए बहुत समय नहीं था, मैंने अपने लण्ड को निशाने पर लगा कर जैसे ही अंदर धकेलना चाहा कि एकता पलट गयी और पलंग पर जा गिरी।

मैं इसके लिए तैयार नहीं था और जैसे मुझे बहुत तेज गुस्सा आ गया पर नाजुक काम के लिए गुस्सा अच्छा नहीं होता।
मैंने खुद पर संयम रखा और एकता को इसी मुद्रा में चोदने का मन बनाया।

एकता के दोनों पैरों को मैंने हवा में उठाया, उसकी पैंटी को उसके पैरों से आज़ाद कर साइड में फेंका, उसकी टांगों के बीच में अपने लिए जगह बनाई और दुबारा से अपने लण्ड को उसकी चूत पर सेट करके धक्का लगाने का प्रयास किया.
पर एकता ने मुझे धकेलकर एक बार फिर से अपना बचाव किया।

मैंने एकता की टांगों को छोड़ा और दादी को आवाज लगाई।
दादी तो जैसे मेरी प्रतीक्षा ही कर रही थी और बाहर से बोल उठी- दामाद जी, थोड़ी देर और मालिश करा लो, सब थकान उतर जाएगी।

एकता समझ चुकी थी कि आज उसको मेरे लंड से चुदने से कोई नहीं रोक सकता।

दोस्तो, मेरी सलहज मेरे सामने करीब करीब पूरी नंगी लेटी थी … मैं उसके सामने अपने खड़े लण्ड का प्रदर्शन कर रहा था और मेरी वासना अपने चरम पर थी.

अब उसको क्या पता था कि ये बिल्ला कितनी बिल्लियों का शिकार कर चुका है।
पर ये तो पक्का था कि आज एकता के सारे भ्रम दूर हो जाने थे और चुदाई तो ज़ोरदार होनी ही थी।
यूँ तो सांवला बदन मुझे जंगली बना देता है दोस्तो … पर एकता में एक अलग ही कशिश थी।

मैं- अगर तुम मेरा साथ दो तो हो सकता है तुम्हारी गोद भर जाए। वैसे भी दादी तो अंगद की दूसरी शादी करने को तैयार है।
एकता- मैं तो कुछ कह सकने की स्थिति में नहीं हूं।
मैं- ऐसा कुछ नहीं एकता रानी … अगर तुम चाहो तो मैं अभी पीछे हट जाता हूँ. पर मैं यह जरूर जानता हूँ कि तुम्हारी ना में तुम्हारी ही हार है.

इतना कहकर मैंने एकता के पैरों को फिर हवा में उठाया और अपना लण्ड एकता की चूत पर सेट करके कुछ देर रुका।
मेरा उद्देश्य यह जानना था कि एकता अब इस चुदाई के लिए तैयार थी या नहीं।

पिछली बार की तरह एकता ने इस बार मुझे नहीं धकेला और मुझे समझ आ गया कि अब रास्ता साफ है।
मैंने हल्के से एकता की चूत में अपने लण्ड को प्रवेश कराने के लिए ज़ोर लगाया ही था कि एकता ने अपनी आंखें बंद कर ली।

उसकी आँखों के कोनों से आंसू बह निकले पर अब वो सिसक नहीं रही थी।
अंगद को बाहर गए करीब 8 महीने होने को आए थे और एकता भी अपनी अगन में जल रही होगी।

मुझे एकता की चूत को भेदने के लिए बहुत मेहनत करनी पड़ रही थी.
और जितनी ज्यादा मेहनत मैं कर रहा था मुझे उतना ही आनंद आ रहा था।

कुछ ही देर में मेरा पूरा लण्ड एकता की चूत में समा चुका था और एकता के चेहरे के भाव से साफ प्रतीत हो रहा था कि मेरा लण्ड एकता को दर्द दे रहा था।

मैंने एकता के ऊपर झुकते हुए एकता के चूचों को उसकी चोली से आजाद किया और धीरे धीरे उसके निप्पलों से खेलना शुरू किया जिससे एकता थोड़ी सहज हो जाए।
एकता के नंगे चुचों का मुझ पर अजीब ही असर हुआ।
वे रसीले तो थे ही, साथ में बड़े गहरे सिक्के पर प्यारे प्यारे से निप्पल मेरा जोश और बढ़ा रहे थे।

जैसा कि आप सभी जानते हैं कि जब किसी टाइट चूत को चोदा जाए और लड़की को दर्द हो रहा हो तो उसके निप्पलों से खेलना उसको सुख प्रदान करता है और उसका ध्यान उसकी चूत में हो रहे दर्द से हट जाता है।
ऐसा ही कुछ एकता के साथ भी होने लगा था.

मैं उसके चेहरे पर बदलते भाव को आराम से पढ़ सकता था।

एकता ने खुद अपने पैरों को हवा में उठा लिया था और मेरी रफ्तार भी बढ़ने लगी थी।
कहीं ना कहीं मेरे मन में ये बात भी थी कि अगर आज मैं एकता को चोद रहा हूँ तो उसकी गोद भी भर जाए।
मैं यह भी जानता था कि अंगद अगले हफ्ते वापस आने वाला है और इसलिए अगर मेरा बीच एकता की कोख में रह भी जाए तो कोई दिक्कत वाली बात नहीं थी।

पर यहाँ कमी थी तो एकता के सहयोग की … जिसके बिना, मैं जानता था कि मुझे कोई मज़ा नहीं आएगा।
अभी के लिए एकता की चुदाई इसलिए भी जरूरी थी कि जब अगली बार मुझे मौका मिलेगा तो मैं इस चुदाई को एकता के परस्पर सहयोग से कर सकता था और अभी मेरे पास पूरे 1 दिन का और 1 रात का समय बाकी था।

एकता को सहज करना मेरे लिए बहुत ज़रूरी था क्योंकि मेरे लिए चुदाई सिर्फ अपना पानी गिराना नहीं बल्कि परस्पर सहयोग के साथ उस सुख को पाना होता है जो दो जिस्मों के एक होने से प्राप्त होता है।

मैंने एकता की चुदाई करते करते एकता को कहा- अगर मेरा बीज तुम्हारी कोख में ठहर गया तो मुझसे ज्यादा खुशी किसी को नहीं होगी।
एकता- जो काम पिछले 8 सालों में नहीं हुआ, वो आज कैसे हो जाएगा?
मैं- हो सकता है कि अंगद में ही कोई कमी हो!

एकता- रोज़ के ताने सुन सुन कर अब तो मुझे यकीन हो चला है कि सारी कमी मेरे में ही है. वैसे भी आपने जो करना था आप कर चुके हैं, अब इन सब बातों का क्या फायदा?

मैं- जब सब हो ही चुका है तो तुम एक बार मेरा साथ देकर भी देख लो ना! हो सकता है कि आज असम्भव भी संभव हो जाए। यकीन मानो, अगर हम दोनों एक साथ स्खलित हुए तो हो सकता है कि तुम्हारी गोद भर जाए। वैसे भी अभी तुमने कहा कि जो मैंने करता था मैं कर चुका, तो क्यों ना तुम भी एक प्रयास कर लो।

इस दौरान मैंने एकता की चुदाई चालू रखी थी और साथ ही मैं उसके निप्पलों का मर्दन भी कर रहा था पर मेरा विशेष ध्यान एकता के चेहरे और उसके भाव पर था।
मैं जानना चाहता था कि मेरी बातों का एकता पर क्या असर हो रहा है।

मेरे आश्चर्य के लिए एक सकारात्मक बदलाव मैंने एकता के भाव में महसूस किया और अब एकता मेरी हर ठाप का जवाब दे रही थी।
इस बदलाव से मेरे भी लण्ड में बदलाव आया और नागराज पहले से ज्यादा सख्त और मोटे हो गए।

बहुत टाइट चूत को चोदने से आम तौर पर मेरा लण्ड थोड़ा छिल जाता है और उससे होने वाले मीठे दर्द और चुदाई के मज़े मिलकर जो आनंद देते हैं वो मैं यहाँ शब्दों में बयां नहीं कर सकता।

मैंने अपनी रफ्तार बढ़ा दी और एकता भी हल्का फुल्का साथ देने लगी थी।
अब मुझे इस चुदाई में मज़ा आने लगा था.

पर कहीं न कहीं मेरे दिलो-दिमाग में ये बात थी कि कुछ हो या ना हो, एकता की गोद जरूर भर जाए।

हमारी चुदाई को करीब 15 मिनट होने को आये थे और एकता भी थोड़ी अकड़ने लगी थी तो मैं समझ गया कि एकता झड़ने वाली है।
इतने समय बाद हो रही चुदाई के कारण एकता को झड़ तो बहुत पहले ज्यादा चाहिए था पर शायद उसका दिमाग इस चुदाई से खुश कम और परेशान ज्यादा था जिसकी वजह से वो अभी तक अपने चरम पर नहीं पहुंची थी।

एकता अब चुदाई के सुख को महसूस कर रही थी जो उसके चेहरे और उसकी आहों से साफ़ महसूस किया जा सकता था.
और मैं भी किसी भी क्षण अपने वीर्य की धार एकता की चूत में छोड़ने वाला था।

शायद हम दोनों ही एक दूसरे की गर्मी के इंतजार में थे कि जैसे ही एक का झरना बहेगा, दूसरा भी अपना पानी गिरा दे।

मेरे खून की रफ़्तार कई गुना बढ़ चुकी थी और मैंने चुदाई की रफ्तार को भी बनाये रखा था।

देखते ही देखते एकता ने दबी घुटी आवाज में एक जोरदार आह भरी और वो स्खलित होने लगी।
एकता के झरने की गर्मी ने जैसे ही मेरे लण्ड को छुआ तो मेरा लण्ड भी पिघल गया और मेरे लण्ड ने भी अपनी पिचकारी एकता की चूत में छोड़ दी।

उसकी चूत से ढेर सारा पानी मेरे नागराज को भिगोता हुआ उसकी चूत से रिसने लगा जिससे मुझे असीम आनंद की अनुभूति हो रही थी।

क्योंकि हमारे पास समय का अभाव था और हमने कमरे को भी बंद नहीं किया था तो थोड़ी देर इस गर्मी को महसूस करने के बाद मैंने एकता को जल्दी से उसके कपड़ों को व्यवस्थित करने को कहा और खुद अपनी लुंगी बांध कर वापस सोफे पर बैठ गया।

एकता भी नजरें झुकाए उठी और उसने अपने कपड़े व्यवस्थित किए।
वह अपनी पैंटी को इधर उधर ढूंढ ही रही थी कि मैंने झट से उसकी पैंटी को उठाया और उसको सूंघने लगा।
क्या मदमस्त खुशबू थी एकता की चूत की यारो … एकता जैसे सवालिया निगाह से मुझसे पूछ रही हो कि ये क्या कर रहे हो.

मैं- तुम जो चाहे ले लो पर ये पैंटी तुम्हारी याद के तौर पर मेरे पास रहेगी.
एकता- दिमाग खराब हो गया है क्या? खुद भी मरोगे और मुझे भी बर्बाद करोगे.

मैं- चाहे इसे मेरी जिद समझो या बचपना … पर अब ये पैंटी मेरे साथ रहेगी और जब तक मैं यहाँ हूँ, तब तक तुम पैंटी नहीं पहनोगी.
एकता- क्या मतलब है आपका? आपने जो करना था, कर तो लिया, अब दुबारा नहीं।

मैं- दोबारा नहीं का मतलब? अब मेरा उद्देश्य तुम्हारे साथ सेक्स करना नहीं बल्कि तुम्हारी गोद भरना है। और मैं कोई चांस नहीं ले सकता। मैं यहाँ परसों सुबह तक हूँ और तब तक जितनी हो सके, तुम्हारी चुदाई जरूर करूँगा।
एकता संकुचाती हुई- कैसी बात कर रहे हो जीजू? रात के अंधेरे की बात और है। अभी तो ये भी नहीं पता कि मम्मी जी क्या कहेंगी। मुझे पहले ही बहुत देर हो चुकी है। मुझे अब चलना चाहिए.

मैं- अभी एक काम बाकी है, वो भी करती जाओ!
एकता सवालिया निगाहों से देखती हुई- अब क्या बाकी रह गया?

मैं- एक बार मेरा लण्ड तो चूस लो एकता रानी.
एकता- दिमाग खराब तो नहीं हो गया आपका?
मैं- कहो तो दादी को एक बार फिर आवाज़ दे दूँ?

हम दोनों वहां पहुंच चुके थे जहाँ कोई किसी बात को ना नहीं कहना चाहता था पर कुछ चीजों का दायरा होता है जो घर के किसी सदस्य पर लागू हो या ना हो पर बहू पर जरूर लागू होता है। इसी लिहाज से एकता थोड़ा संकोच कर रही थी.

पर मेरे जिद करने पर वो दोबारा जमीन पर बैठ गयी और मेरी लुंगी को खोल मेरे लण्ड को हाथ में लेते हुए उसने अपने मुँह में भर लिया।

“ओह एकता, तुम नहीं जानती तुमने क्या सुख दिया है … ज़रा इसको पूरा अंदर तो लो!”

एकता शायद इतने मोटे लण्ड के लिए अभ्यस्त नहीं थी और उसको मेरा मोटा लण्ड निगलने में दिक्कत हो रही थी।
मैं भी ज्यादा जबरदस्ती नहीं करना चाहता था क्योंकि आगे होने वाली चुदाई का रास्ता साफ हो चुका था।

मेरा मन तो अभी भरा नहीं था मगर कमरे के बाहर से मेरी सास ने एकता को आवाज लगा दी और हम दोनों को व्यवस्थित होकर बैठना पड़ा।

एकता खड़ी हुई, तेल का बर्तन उठाया और कमरे के बाहर निकल गयी।
तो एकता की आवाज सुनकर दादी ने एकता को कहा- मैंने दामाद जी के लिए दूध गर्म कर दिया है। चीनी मिलाकर उनको दे देना।

मेरा मन एक बार फिर उछल कूद करने लगा कि एकता जब दूध लेकर आएगी तो एक राउंड और हो जाएगा।

तो जब एकता दूध लेकर आई तो क्या हुआ? वो आपको अगले भाग में बताऊँगा।
आज के लिए इतना ही काफी है।

आशा है आप सभी लण्ड धारकों ने कहानी पढ़ते हुए अपना पानी गिरा दिया होगा और गरमागर्म भाभियों ने अपनी चूत को मसोड कर अपनी गर्मी शांत कर ली होगी।

आप सेक्स इन ला रिलेशन स्टोरी पर अपने कमेंट्स मुझे लिखकर भेज सकते हैं और ईमेल करने के लिए मेरी ईमेल [email protected] पर लिख सकते हैं।
आपके कमेंट और प्यार के इंतजार में!
आपका प्यारा राहुल
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