रजनी की चुदाई उसीकी की जुबानी-4

पिछला भाग यहाँ पढ़े – रजनी की चुदाई उसीकी की जुबानी-3

“कैसा सरप्राइज़ “? मैंने पूछा, कपड़े मेरे हाथ में ही थे।

“वही, जो मैंने कल कहा था कि आज सरप्राइज़ दूंगा “, दीपक बोला।

मुझे याद आ गया, मैं तो भूल ही चुकी थी कि दीपक ने ऐसा कुछ कहा था। मैंने कपड़े फिर से बिस्तर पर रख दिए और पूछा, “क्या सरप्राइज़ है? ”

“अभी पता लग जाएगा, आ जाओ “। मैं उसके साथ लेट गयी। ट्रेलर फिर शरू हो गया। उसके हाथ मेरी चूचियों पर और मेरी चूत पर और मेरा हाथ उसके लंड पर। दस बारह मिनट के बाद दीपक उठा और बोला, “चलो अब पीछे से करेंगे”। गरम तो मैं हो ही चुकी थी। जिस चूत को थोड़ी देर पहले साफ़ कर के तौलिये के साथ पोंछ कर आयी थी वो फिर गीली हो चुकी थी।

मैं उठी और कोहनियां बिस्तर पर टिका कर टांगें चौड़ी करके खड़ी हो गयी और दीपक के लंड का इंज़ार करने लगी। “दीपक लंड अंदर डाल क्यों नहीं रहा, क्या कर रहा है ” !

तभी मुझे लगा कि दीपक मेरी गांड के छेद पर कुछ लगा रहा है – कुछ चिकना चिकना ठंडा ठंडा। मैंने सर घुमा कर पूछा, “क्या कर रहे हो दीपक “? “तुम्हें सरप्राइज़ देने की तैयारी कर रहा हूँ। आज तुमही गांड चुदाई करूंगा “।

“तो ये था सरप्राइज़ “। मैंने कभी गांड नहीं चुदाई थी। मगर इतना पता था कि चूत में से चुदाई से पहले जो लेसदार पानी निकलता है वो असल में कुदरत का करिश्मा है जिससे लंड फिसल चूत में चला जाता है। गांड में से ऐसा कुछ नहीं निकलता इस लिए गांड के छेद पर ढेर सारी चिकनी जैल या क्रीम लगानी पड़ती है ।

दीपक गांड पर जैल लगा रहा था। थोड़ी जैल उंगली से गांड के अंदर भी लगा रहा था। गांड कि इस मालिश और गांड के अंदर उंगली ने मुझे बेसबर कर दिया। मन कर रहा था कि डाले लंड अंदर, एक नया तजुर्बा होने वाला था – गांड मरवाने का, गांड चुदवाने का।

आखिर दीपक ने अपना लंड गांड के छेद के ऊपर रक्खा और थोड़ा सा अंदर किया। मुझे बड़ी दर्द हुई। मैं आगे की तरफ हुई। दीपक ने अब मेरी कमर पकड़ ली जिससे मैं आगे ना जा सकूं और लंड अंदर जाये। दीपक ने लंड फिर अंदर धकेला। मुझे सच में हे दर्द हो रहे थी। मैंने दीपक से कहा, “दीपक ये तो बड़ा दर्द करता है “।

दीपक ने मुझे समझाया, “शुरू शुरू में थोड़ा दर्द होता ही है। पहली गांड चुदाई में ढेर सारी जैल लगानी पड़ती है और लंड को थोड़ा थोड़ा अंदर डालते हैं। पहली बार पूरा अंदर करने में आठ दस मिनट भी लग जाते हैं “।

अब मुझे कुछ हिम्मत हुई। दीपक ने वैसा ही किया जैसा कहा था। लंड थोड़ा अंदर डाला, फिर बाहर निकल कर खूब सारी जैल लगाई और लंड थोड़ा और अंदर किया। थोड़ी ही देर में दीपक का आधा लंड अंदर था। दीपक जरा भी जल्दी नहीं कर रहा था।

” आखिर मैं कहीं भागी तो जा नहीं रही थी “।

अगले दस मिनट में लंड पूरा अंदर था। मुझे दर्द तो हो रहा था और मैं महसूस भी कर रही थी कि मेरी गांड का छेद चौड़ा हो गया है – गांड की छेद के प्रवेश द्वार के ऊपर ही रगड़ाई का मजा आता है। जितना मोटा और लम्बा लंड, गांड के प्रवेश द्वार की उतनी ज़्यादा रगड़ाई, उतना ज़्यादा मजा। बस जैल खूब सारी लगी होनी चाहिए। मैंने अपना सर अपनी बाहों में रख लिया और गांड चुदाई का मजा लेने लगी।

“चूत चुदाई, गांड चुदाई – ये चुदाई भी क्या मस्त चीज़ है। क्या होता अगर चूत और लंड दोनों में से कोइ एक ना होता”।

तभी दीपक की आवाज़ आयी, “अरे सरोज तुम ” ?

मैंने सर उठाया और पीछे मुड़ कर देखा, सरोज खड़ी थी, बिकुल नंगी। तो सरोज चुदाई देख ही रही थी ? वो बोली, “तुम लोग करते रहो”। वो बिस्तर पर आयी और अपनी चूत मेरे मुंह के आगे कर के लेट गयी और अपनी टांगें चौड़ी कर दी। सरोज की चिकनी चूत मेरे सामने थी। सरोज ने अपने हाथों से अपनी चूत चौड़ी कर दी। गीली गुलाबी फुद्दी मेरी आँखों के सामने थी। मैंने अपने होठ सरोज की चूत पर लगा दिए और जबान से ऊपर नीचे चूत चाटने लगी।

दीपक मेरी गांड चोद रहा था और मैं सरोज की चूत चाट रही थी। मेरी गांड दुखने लग गयी थी। मैंने दीपक को कहा, “दीपक मेरी गांड दुःख रही है “।

दीपक ने लंड बाहर निकल लिया और खड़ा हो गया। सरोज उठी और कुहनियां बिस्तर पर रख कर टांगें चौड़ी कर के खड़ी हो गयी। अब मेरी और सरोज की जगह बदल गयी थी। सरोज मेरी जगह थी और मैं सरोज की जगह – मतलब दीपक का लंड सरोज की गांड में था और सरोज मेरी चूत चाट रही थी।

थोड़ी चुदाई के बाद दीपक बोला अब दोनों आ जाओ। अब मैं बारी बारी से दोनों की गांड की चुदाई करूंगा। हम दोनों पलंग पर कुहनियों रख के खड़ी हो गयी और गांड चौड़ी कर दी। दीपक हम दोनों की गांड बारी बारी से चोद रहा था। मैं तो एक बार चूत की चुदाई का मजा ले चुकी थी, फिर से अपनी उंगली चूत में डाल कर चूत का दाना – भग्नाशा – रगड़ना शुरू कर दिया। सरोज पूरी गरम हो चुकी थी – वो लम्बी लम्बी साँसें ले रही थी। लगता था हमारी चुदाई देखते हुए अपनी चूत काफी रगड़ चुकी थी।

दीपक बोला, अब तैयार हो जाओ। तुम दोनों की गांड के ऊपर वीर्य निकालूँगा। मैंने अपनी चूत जोर जोर से रगड़ने शुरू कर दी। सरोज भी यही कर रही थी। दीपक अपने लंड को कभी मेरी गांड के साथ लगाता था कभी सरोज की गांड के साथ और हाथ से मुठ मार रहा था। जल्दी ही दीपक ने एक बड़ी हुंकार भरी – “आह… ओह… आ… मजा आ गया” – और उसने बारी बारी से लंड मेरी और सरोज की चूत के साथ सटाया। उसका गरमा गरम वीर्य मेरी और सरोज की गांड पर भल भल करके गिरा और नीचे कि तरफ बहने लगा।

“ये भी क्या अनुभव था। गांड के छेद पर गर्म वीर्य और नीचे की तरफ बहता हुआ। इस अनुभव ने ही हमारी चूत का पानी निकल दिया। हम तो निहाल हो गयीं ”।

चुदाई खत्म हो चुकी थी। हम तीनो ही बाथरूम में चले गए। तभी कुछ ऐसा हुआ जिसकी मैंने कल्पना भी नहीं की थी।

सरोज मुझ से बोली, “बैठ जाओ।” मैंने पूछा “क्यों ?” उसने कहा “बैठो तो सही ” ?

मैं घुटनों के बल बैठ गयी। मेरे पास ही सरोज भी घुटनों के बल बैठ गयी।

सरोज दीपक से बोली, “चलो दीपक शरू हो जाओ।” दीपक ने लंड हाथ में लिया और हमारे ऊपर मूत की धार डाल दी। एक बार तो मैं सकपकाई, मगर जब सरोज कि तरफ देखा तो हैरान रह गयी। सरोज ने मुंह खोला हुआ था और दीपक के लंड से गर्म मूत सरोज के मुहं में जा कर बाहर निकल कर बह रहा अनायास ही, मैंने भी मुँह खोल दिया। दीपक अब मेरे ऊपर भी पेशाब कर रहा था।

ये हो क्या रहा था। आधा घंटा हम यही कुछ करते रहे। जब चलने लगे तो दीपक बोला, ” याद रखना, परसों तो माँ और बाउजी आ जायेंगे “।

“माँ !!!” ,मेरी तो हंसी छूट गयी – करता है चुदाई, और बोलता है माँ – पर मैं ही कौन सी कम थी। दीपक मेरा भी तो भाई ही था, क्या हुआ जो सौतेला था “।

मैंने सरोज को कहा, सरोज आज मेरे साथ ही मेरे कमरा में सो जाओ, अकेले कहाँ सोवोगी”। वो हंस कर बोली, “हाँ ठीक है क्या पता रात को फिर मन कर आये और उंगली करनी पड़े “।

मैं भी हंस पडी, और हम दोनों मेरे कमरे में चले गए, कपड़े उतरे और नंगे ही बिस्तर में घुस गयीं। लेकिन पूरी रात हम सोई नहीं, ऐसी ऐसी चूत और गांड चुसाई की क्रीड़ा की कि कोइ कल्पना भी नहीं कर सकता।

सुबह जब मैं उठी तो सरोज पहले ही उठ चुकी थी। में रात के किस्से याद करके मुस्कुरा पडी। मैंने कपड़े पहने और रसोई में गयी सरोज काम कर रही थी। मैंने पीछे से सरोज की चूचियों को पकड़ा और बोली, “मज़ा आ गया।” सरोज घूमी और मेरे होठों को अपने होठों मैं पकड़ कर चूसने लगी।

उस रात हमने फिर दीपक के साथ चूत और गांड की चुदाई की।

ये सिलसिला मेरी छुट्टियां खत्म होने तक चलता रहा। अगर माँ कहीं बाहर होती तो दीपक, अगर माँ घर पर ही होती तो संतोष।

रजनी आपबीती सुनाने के बाद चुप हो गयी – लगता था कुछ सोच रही है। “अपनी चुदाई के बारे में ही सोच रही होगी “।

मेरी हालत बड़ी खराब थी। चुदाई की इच्छा होने लगी थी । मगर अब इस वक़्त लंड कहाँ। मैंने रजनी से ही कहा, “रजनी तुम्हारी छुट्टियों के कहानी सुन कर चूत गर्म हो गई है। लंड मांग रही है – क्या करें ”

वो बोली, ” मेरी भी यही हालत है, पर इस वक़्त तो कुछ नहीं होगा, कल देखते है “।

मगर मुझ से नहीं रहा जा रहा था। मैंने कहा, ” पर अभी क्या करें ” ?

रजनी ने कुछ देर सोचा और बोली, “चलो आज हम वही करते हैं जो सरोज और मैं आपस में करती थी “।

हम दोनों ने कपड़े उतार दिए। फिर जो हुआ उसकी मुझे कल्पना नहीं थी। हमने एक दुसरे की चूत चाटी, गांड के छेद में जुबान घुसाई और अंत में बॉथ रूम में पहले वो बैठ गई और टांगें चौड़ी करके मैंने उसके ऊपर मूता फिर मैं बैठी और उसने मेरे ऊपर मूता।

“पूरे जिस्म पर गरमा गर्म मूत – ये बताने वाली नहीं खुद किसी के साथ करके महसूस करने वाली चीज़ है। ”

हल्की हो कर हम फिर लेट गयी।

“रजनी, अगली बार कब जाओगी करनाल “?

” छुट्टियों में। वैसे मैं सरोज को नंबर दे कर आयी हूँ। मां और बाबू जी पंद्रह दिन के लिए रामेश्वरम जायेंगे। सरोज मुझे फोन करेगी तब जाऊंगी।

मेरी तो चूत में खजली छिड़ गयी और गांड का छेद खुलने बंद होने लगा। मैंने बड़े ही दबे स्वर में पूछा, “रजनी, मुझे भी ले जाओगी ” ? मुझे भी चूत और गांड ,,,,,,,,,” , उसने मुझे बीच में ही टोक दिया, अरी मेरी जान आभा, मैं तुझे कैसे छोड़ दूंगी ? अगर तू ना भी कहती तो भी मैं तुझे ले कर जाती। तीन लड़के तीन लड़कियां “।

मैंने पुछा, “तीसरा कौन ” ?

रजनी ने मेरी चूत में उंगली डाल कर कहा – “सरोज का देवर राकेश, वो नहीं था वहाँ। सरोज कह रही थी क्या गांड की पिलाई करता है। इस बार वो नहीं था वहां, तो उससे गांड नहीं चुदवा पाई “।

मैं तो सोच सोच कर ही मस्ती में आ गई। मैंने रजनी को कहा, “गांड में भी उंगली करो रजनी “।

रजनी हंसी, “ये ले मेरी ठरकी आभा ” – और पूरी उंगली रजनी ने मेरी गांड के छेद में डाल दी।

मैं भी हंसी ,”मजा आ गया ठरकी रजनी – यही है ज़िंदगी”।

और हम दोनों हंसने लगी।

“सच ही तो है। बढ़िया चुदाई भी ज़िंदगी में ज़रूरी है – चुदाई बढ़िया न हो तो ज़िंदगी बेमानी है “।

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